Thursday, March 7, 2019

UP में महागठबंधन: 15 सीट लेकर कांग्रेस मिला सकती है सपा-बसपा से हाथ

एयर स्ट्राइक के बाद उत्तर प्रदेश के राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. कांग्रेस को अलग-थलग कर गठबंधन का ऐलान करने वाले सपा-बसपा ने नए सिरे से राजनीतिक समीकरण बनाने में जुट गए है. सपा-बसपा ने गठबंधन में पहले आरएलडी को शामिल किया और अब कांग्रेस को हिस्सेदार बनाने की कवायद की जा रही है. माना जा रहा है कि सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को 15 सीटें मिल सकती हैं.

यूपी में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले बीजेपी के विजयरथ को रोकने के लिए सपा-बसपा गठबंधन कांग्रेस को भी साथ लाने में जुटे हैं. इस दिशा में तीनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के बीच बातचीत जारी है. कांग्रेस ने 20 सीटों की डिमांड रखी हैं, लेकिन गठबंधन ने उन्हें पहले 9 सीटें देने का ऑफर रखा था, जिसे पार्टी ने स्वीकार नहीं किया. इसके बाद कांग्रेस ने 15 प्लस 2 सीटों की डिमांड रखी. दो सीटें रायबरेली और अमेठी हैं. इस तरह कांग्रेस 17 सीटें मांग रही हैं.

हालांकि, सूत्रों के मुताबिक 13 प्लस 2 सीटों पर कांग्रेस के साथ समझौता होने के कगार पर है. इस तरह कांग्रेस के खाते में कुल 15 सीटें आ सकती हैं. कांग्रेस के लिए सपा अपने कोटे से 7 और बसपा अपने कोटे से 6 सीटें देंगी. जबकि, बाकी दो सीटों पर पहले ही सपा-बसपा ने कांग्रेस के खिलाफ उम्मीदवार न उतारने का ऐलान कर रखा था. 

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने खुद ही आजतक से बातचीत में बताया है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के साथ गठबंधन की अब संभावना नहीं लगती है, लेकिन यूपी में हमारी बातचीत जारी है और सही दिशा में है. इसका मतलब साफ है कि सूबे में नए सिरे से गठबंधन बन रहा है.

एयर स्ट्राइक के बाद उत्तर प्रदेश में तीनों दलों की राजनीतिक परिस्थितियां बदल गई हैं, जिसके चलते नए सिरे से गठबंधन का फैसला किया गया है. इसी मद्देनजर कांग्रेस की महासचिव और पूर्वांचल की प्रभारी प्रियंका गांधी ने सूबे का दौरा टाल हुआ है.

बता दें कि उत्तर प्रदेश में बीजेपी को मात देने के लिए सपा-बसपा ने गठबंधन का ऐलान किया था. सूबे की कुल 80 लोकसभा सीटों में से 38 बसपा और 37 सीटों पर सपा ने चुनाव लड़ने की घोषणा की थी. जबकि तीन सीटें आरएलडी को देने का ऐलान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी के साथ ज्वाइंट प्रेस कॉफ्रेंस करके ऐलान किया है.

गुटेरेस ने कहा, "मैं दोनों देशों के बीच वार्ता के संबंध में मध्यस्थता की पेशकश करता रहा हूं, लेकिन अभी तक सफलता की कोई स्थिति पैदा नहीं हुई है." उन्होंने कहा, "भारत और पाकिस्तान दोनों की अंतरराष्ट्रीय मामलों में महत्ता है, इसलिए मैं उम्मीद करता हूं कि दोनों देश एक अर्थपूर्ण वार्ता करने में सक्षम होंगे."

भारत शुरू से पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय वार्ता के लिए संयुक्त राष्ट्र या किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से इनकार करता रहा है. भारत का मानना है कि 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच हुए शिमला समझौते में इस बात पर समझौता हुआ था कि दोनों देश अपने विवाद आपस में सुलझाएंगे, न कि तीसरा पक्ष इसमें शामिल होगा.

हालांकि अभी हाल में रूस और अमेरिका जैसे देशों ने भारत और पाकिस्तान के बीच पनपे तनाव को कम करने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश की थी. पहले भी ऐसी खबरें आई थीं कि रूस दोनों देशों के बीच तनाव कम करने में मदद के लिए वार्ता की मेजबानी कर सकता है. समाचार एजेंसी तास ने लावरोव के हवाले से कहा, "निश्चित रूप से, अगर वे ऐसा चाहें तो." विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जाखारोवा ने भी कहा कि मास्को, भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव को कम करने में मदद के लिए कुछ भी करने को तैयार है.

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